Friday, 8 August 2014

સ્ફટિકના પરપોટા જેવું બનેલું ચંદ્રમૌલેશ્વર શિવલિંગ

- આ લિંગ પાંડવોના સમયનું માનવામાં આવે છે

- શિવલિંગનો સીધો સંપર્ક આકાશ સાથે નથી, છતાં ચંદ્રકળાની અસર દેખાય છે

 

વાત છે. અમદાવાદથી ૪૦ કિ.મી. દૂર આવેલા ધોળકા તાલુકાના કલીકુંડમાં આવેલા ભગવાન ચંદ્રમૌલેશ્વર શિવાલયની. ભગવાન ચંદ્રમૌલેશ્વર મહાદેવ મંદિરમાં સ્વયંભૂ પ્રગટેલા શિવલિંગ સ્ફટિકના પરપોટા જેવું છે. તે જોતાં એમ લાગે છે કે આ શિવલિંગ બહુ ઓછાં જોવાં મળે છે. આ લિંગમાં ચંદ્રકળાની સીધી અસર થાય છે, તેથી આ શિવલિંગને ચંદ્રમૌલેશ્વર મહાદેવ કહેવાય છે. સાથેસાથે શિવલિંગ જેવું હોવાથી પરપોટિયા મહાદેવ તરીકે ઓળખાય છે.

એમ કહેવાય છે કે પાંચ હજાર વર્ષ પહેલાં ચંદ્રમૌલેશ્વર ભગવાન પોતે અહીં પ્રગટ થયા હતા. વિશ્વના અન્ય અન્ય એક સ્તંભ આકારનાં શિવલિંગ કરતાં વિશિષ્ટ સ્ફટિકના સુંવાળા, સુંદર તથા ભવ્ય પરપોટાના સ્વરૂપ જેવું આ શિવલિંગ બનેલ છે. આ પરપોટાની સાચી સંખ્યા ગણી શકાય તેમ નથી. કોઈ વિવિધ પરપોટા પર ચંદનથી તિલક કરી ગણતરી કરે તો પણ તેની સાચી ગણતરી થઈ શકતી નથી. આ લિંગ પાંડવોના સમયનું માનવામાં આવે છે. પાંડવોએ તેમના ગુપ્તકાળ દરમિયાન આ વિસ્તારમાં રોકાણ કર્યું હતું. તે દરમિયાન તેમણે આ દિવ્ય તથા ચમત્કારિક લિંગની પૂજા કરી હતી. આ અદ્ભુત શિવલિંગનો સીધો સંપર્ક આકાશ સાથે નથી. છતાં ચંદ્રકળાની અસર તેના પર દેખાય છે.

સૌથી આગળના ભાગમાં મધ્યમાં આવેલ એક ખાસ પરપોટામાં ચંદ્રકળાની વધઘટ દેખાય છે. ઉપરાંત તેમાં ૐના દર્શન થાય છે. શિવજીની જટાનાં પણ દર્શન થાય છે. આમ ચંદ્રદર્શનના તેના આગલા સ્વભાવને કારણ તે ચંદ્રમૌલેશ્વર તરીકે ઓળખાય છે. મહાશિવરાત્રીની રાત્રે અહીં ચાર પ્રહરની પૂજા થાય છે. ચારેય પ્રહરના જુદાજુદા ચંદ્રદર્શનનો લાભ શિવભકતોને મળે છે. પૂનમ તથા અમાસના અલગ અલગ દર્શનનો લાભ લાખો લોકો લે છે.

સૌરાષ્ટ્ર યાત્રાધામ જડેશ્વર મહાદેવ કે જેના મંદિરનો આકાર પાંડવોના રથ જેવો

શિવમંદિરોમાં કાચબા અચૂક જોવા મળે ; શું તમે મહત્વ જાણો છો..?

                                                   - કાચબો એ સંયમનું પણ પ્રતિક છે

સ્કંધ પુરાણમાં વર્ણવેલા અને વડનગરમાં આવેલા નાગરોના દેવ હાટકેશ્વર..!!

પવિત્ર શ્રાવણ માસમાં શિવજ્યોતિ સ્વરૂપ દ્વાદશ જ્યોતિર્લીંગ જાણો અને દર્શન કરો

Monday, 4 August 2014

संसार में व्याप्त है गुरु-तत्व

गुरु अंगुली पकड़कर नहीं चलाता, बल्कि शिष्य के मार्ग को प्रकाशित कर देता है। चलना शिष्य को ही पड़ता है। पूरे संसार में यह गुरु-तत्व व्याप्त है, तभी हम किसी से भी कुछ भी सीख सकते हैं।
व्यास उमाशंकर शर्मा का चिंतन..
हमारी संस्कृति में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश से भी अधिक महत्व दिया गया है, परंतु गुरु अपने को ऐसा नहीं मानता। वह केवल शिष्य की श्रद्धा में अतिविशिष्ट है, क्योंकि स्वयं को सर्वोच्च मानने पर गुरु स्वयं अहंकार द्वारा पतन की ओर उन्मुख हो सकता है। गुरु का कार्य शिष्य को अध्यात्म की ओर प्रेरित करना है। दूसरे अर्थो में कह सकते हैं कि गुरु केवल व्यक्ति नहीं, बल्कि एक तत्व है और वह तत्व किसी भी अवस्था या रूप में हो सकता है। व्यावहारिक भाषा में हम कह सको हैं कि गुरु तब तक है, जब तक उसमे कोई लौकिक स्वार्थ या प्रलोभन न जुड़ा हो।
गुरु शिष्य को अंगुली पकड़कर नहीं चलाता, बल्कि उसके मार्ग को प्रकाशित करता है। शिष्य को स्वयं ही उस मार्ग पर चलना होता है। सारे संसार में यह गुरुतत्व व्याप्त है। वह प्रत्येक व्यक्ति के लिए, प्रत्येक दिन तथा प्रत्येक देश में प्राप्त होता है। केवल शिष्य को खोजी होना
चाहिए, उसके अंत:करण में यह ललक विद्यमान होनी चाहिए कि उसे गुरु मिलें। गरुड़ जी पक्षियों के राजा हैं, किंतु उन्होंने कागभुशुंडि जी को अपना गुरु बनाया। वह कहते भी यही हैं कि बिना गुरु के संसार रूपी सागर से उद्धार संभव नहीं, चाहे वह ब्रह्मा हों अथवा शंकर ही क्यों न हों। श्रीराम और श्रीकृष्ण साक्षात ईश्वर माने गए हैं, किंतु जब वे अवतार लेकर इस धरती पर आते हैं, तब वह भी गुरु का ही वरण करते हैं। श्रीराम गुरु वशिष्ठ जी व विश्वामित्र को तथा भगवान श्रीकृष्ण महर्षि सांदीपनि को अपना गुरु बनाते हैं।
वास्तव में जिसके समक्ष
जाकर हमारे हृदय में आस्था, विश्वास तथा प्रेम का उदय हो जाए, वस्तुत: वही हमारा गुरु है। एक विदेशी विद्वान पालविंटन ने भारत आकर अनेक विद्वानों तथा महापुरुषों से संपर्क किया, जिनमें कई योगियों के चमत्कार भी उन्होंने देखे। किंतु वे सबसे अधिक प्रभावित हुए महर्षि रमण से, क्योंकि उन्होंने चमत्कार को ही अध्यात्म का आधार नहीं माना था। वस्तुत: गुरु चमत्कारों की अपेक्षा अपने ज्ञान से शिष्य का आध्यात्मिक मार्ग प्रकाशित करता है। स्वामी विवेकानंद ने स्वामी रामकृष्ण देव को गुरु के रूप में स्वीकार किया। पुराणों के अनुसार, राजऋषि जनक जी ने अनेक महापुरुषों का सान्निध्य प्राप्त किया, लेकिन उन्हें अपना गुरु न बनाकर अष्टावक्र जी को गुरु के रूप में स्वीकार किया। मान्यता है कि अष्टावक्र जी का शरीर आठ जगह से टेढ़ा था।
वस्तुत: गुरुत्व तो व्यक्ति के ज्ञान में समाहित है। उसे वैभव, ऐश्वर्य अथवा सौंदर्य से नापा नहीं जा सकता।

चातुर्मास: संयम की साधना का समय


गुरु पूर्णिमा: जागरूकता से मिलते हैं गुरु

जब तक हमारी इंद्रियां सक्रिय नहीं हैं, हमारे भीतर जागरूकता नहीं है, तब तक गुरु के होते हुए भी हमें गुरु नहीं मिलता। गुरु हमें तभी मिलता है, जब हम पूरी तरह जागरूक हों।
गुरु पूर्णिमा (12 जुलाई) पर ओशो का चिंतन..
गुरु की खोज जितनी सरल और सहज हम समझते है, उतनी आसान नहीं है। कोई नहीं कह सकता, 'वहां जाओ और तुम्हें तुम्हारा सद्गुरु मिल जाएगा।' तुम्हें खोजना होगा, खोजने के दौरान जिन मुश्किलों का सामना करोगे, उनके द्वारा ही तुम उसे पहचानने के योग्य हो पाओगे। तुम्हारी आंखें स्वच्छ हो जाएंगी। आंखों के आगे आए बादल छंट जाएंगे और बोध होगा कि यह सद्गुरु है।
एक सूफी फकीर था जुन्नैद। वह अपनी जवानी के दिनों में जब गुरु को खोजने चला तो वह एक बूढ़े फकीर के पास गया। उससे कहने लगा, 'मैंने सुना है कि आप सत्य को जानते हैं। मुझे कुछ राह दिखाइए।' बूढ़े फकीर ने एक बार उसकी ओर देखा और कहा, 'तुमने सुना है कि मैं जानता हूं, तुम नहीं जानते कि मैं जानता हूं।'
जुन्नैद ने कहा, 'आपके बारे में मैं कुछ नहीं जानता। बस मुझे वह राह दिखाएं जहां मैं अपने गुरु को खोज लूं। आपकी बड़ी कृपा होगी।' वह बूढ़ा आदमी हंसा और कहने लगा, 'जैसी तुम्हारी मर्जी, बता तो मैं दूंगा, लेकिन खोजना तुम्हें ही होगा। मुझे लगता है तुम्हें काफी भटकना पड़ेगा, क्या इतना साहस और धैर्य है तुम में?'
जुन्नैद ने कहा, 'उसकी चिंता आप जरा भी मत करें, धैर्य और साहस मुझमें है। बस मुझे यह बता दें कि गुरु कैसा दिखाता होगा? कैसे कपड़े पहने होगा?' फकीर ने कहा, 'उसकी जटाएं बहुत लंबी होंगी। उसकी आंखों में प्रकाश जैसी आभा होगी। वह नीम के वृक्ष के नीचे बैठा होगा। उसके आसपास तुम्हें कस्तूरी की गंध महसूस होगी।'
जुन्नैद बीस वर्ष तक यात्रा करता रहा। एक जगह से दूसरी जगह। बहुत कठिन मार्ग से चल कर गुप्त जगहों पर भी गया। लेकिन उसे न तो वह पेड़ मिला, न किसी की आंखों में प्रकाश और न ही कस्तूरी सुगंध ही मिली। बीस वर्ष बाद वह एक वृक्ष के पास पहुंचा। गुरु वहां पर था। कस्तूरी की गंध भी महसूस हो रही थी उसके आसपास। हवा में शांति भी थी। उसकी आंखें प्रज्ज्वलित थीं प्रकाश से। उसकी आभा को उसने दूर से ही महसूस कर लिया।
यही वह व्यक्ति था, जिसकी वह तलाश कर रहा था। जुन्नैद गुरु के चरणों पर गिर गया। आंखों से उसके आंसू की धार बहने लगी, 'गुरुदेव, मैं आपको बीस वर्ष से खोज रहा हूं।'
गुरु ने उत्तर दिया, 'मैं भी बीस वर्ष से तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूं। देख जहां से तू चला था यह वही जगह है। देख मेरी ओर। जब तू मुझसे गुरु की पहचान पूछने आया था, तब से मैं यहां तेरा इंतजार कर रहा हूं।' जुन्नैद रोने लगा। बोला, 'आपने मेरे साथ मजाक क्यों किया? आप पहले ही कह सकते थे मैं तेरा गुरु हूं। बीस वर्ष बेकार कर दिए।'
बूढ़े आदमी ने जवाब दिया, उससे तुझे कोई मदद न मिलती। उसका कुछ उपयोग न हुआ होता। क्योंकि जब तक तुम्हारे पास आंखें होते हुए भी देखने के लिए आंखे नहीं हैं, नाक होते हुए भी सूंघने के लिए नाक नहीं है, तब तक सब व्यर्थ था। इन बीस वषरें तुम देखना, सूंघना, महसूस करना सीखे हो। मैं वहीं व्यक्ति हूं, जिसे तुम बीस साल पहले नहीं पहचान पाए, लेकिन अब पहचान सके। तुम बदल गए। इन पिछले बीस वषरें ने तुम्हें मांजा है। सारी धूल छंट गई। तुम्हारा मैं विलीन हो गया। तुम्हारे नासापुट संवेदनशील हो उठे, जो इस कस्तूरी की सुगंध को महसूस कर सके। कस्तूरी की सुगंध तो बीस साल पहले भी यहां थी। तुम्हारा हृदय स्पंदित हो गया है, उसमें प्रेम का मार्ग खुल गया है। वहां पर एक आसन निर्मित हो गया है, जहां तुम आपने प्रेमी को बिठा सकते हो। यह संयोग तब संभव नहीं था।
मैं नहीं कहता कि गुरु पर श्रद्धा करो। केवल इतना कहता हूं कि ऐसा व्यक्ति खोजो, जहां श्रद्धा घटित होती है। वही व्यक्ति तुम्हारा गुरु है। तुम्हें घूमना होगा, क्योंकि खोजना आवश्यक है। खोज तुम्हें तैयार करती है। ऐसा नहीं है कि खोज तुम्हें तुम्हारे गुरु तक ले जाए। खोजना तुम्हें तैयार करता है, ताकि तुम उसे देख सको। हो सकता है वह तुम्हारे बिल्कुल नजदीक हो।

सेवा को समर्पित जीवन

सिखों के आठवें गुरु थे श्री हरि किशन जी। उन्हें बालगुरु कहा गया, क्योंकि सातवें गुरु और पिता श्री हरि राय जी ने ज्योति-जोत समाते समय मात्र पांच वर्ष की आयु में हरि किशन जी को गुरुगद्दी की जिम्मेदारी सौंप दी थी। छोटी सी उम्र में ही गुरु जी के अंदर गरीबों, लाचारों और बीमारों के प्रति अपार संवेदना थी। दिल्ली में जब चेचक की जानलेवा महामारी फैली तो गुरु जी बीमारों की सेवा में लग गए और उसी बीमारी से ग्रस्त होकर मात्र आठ वर्ष की उम्र में ज्योति ज्योत समा गए। उनका छोटा-सा जीवन भी उनके विराट व्यक्तित्व की अद्भुत झांकी दिखा जाता है। गुरु जी अत्यंत गंभीर, सहनशील एवं विशिष्ट आध्यात्मिक साम‌र्थ्य से ओतप्रोत थे। विनम्रता एवं सेवा गुरु जी के व्यक्तित्व के महत्वपूर्ण गुण थे।
बालगुरु के अद्भुत व्यक्तित्व से प्रभावित होकर औरंगजेब गुरु जी को दिल्ली बुलाना चाहता था, परंतु गुरु जी बादशाह की धार्मिक कट्टरता से अत्यंत क्षुब्ध थे। अंबर नरेश राजा जय सिंह के आग्रह पर गुरु जी दिल्ली तो आए, परंतु उन्होंने औरंगजेब के दरबार में जाना स्वीकार नहीं किया। गुरु जी के दिल्ली-प्रवास के दौरान ही दिल्ली में चेचक की महामारी फैल गई। चेचक ग्रस्त लोगों की दयनीय दशा देखकर बाल-गुरु का कोमल एवं स्नेहशील हृदय विदीर्ण हो उठा। वे चेचक के रोगियों की देखभाल और सेवा करने में जुट गए। इतनी छोटी उम्र में लोक के कष्ट एवं पीड़ा के प्रति उनके अंदर इतनी सहानुभूति थी।
गुरु जी द्वारा दी गई औषधि एवं की गई सेवा द्वारा अनेक रोगी भले-चंगे हो गए। इस सेवा से गुरु जी की महिमा दसों दिशाओं में फैल गई। यह देखकर औरंगजेब ने स्वयं गुरु जी के दर्शनों की अभिलाषा व्यक्त की, परंतु गुरु जी ने इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया और वे चेचक रोगियों की सेवा में व्यस्त रहे।
अंतत: गुरु जी भी चेचक की गिरफ्त में आ गए। जीवन-काल की पूर्णता निकट अनुभव कर गुरु जी ने 'बाबा बकाले' कहकर अगले गुरु श्री तेग बहादुर जी की ओर संकेत किया और वे ज्योति-जोत समा गए।

Friday, 1 August 2014

કમળને શુભ શા માટે માનવામાં આવે છે?

તીર્થોનાં પુણ્ય કરતાં વધારે.............

પતિ-સંતાનોને દીર્ઘાયુ આપતું વ્રત એવરત-જીવરત

પરિશ્રમ એ ચાવી છે, જે કિસ્મતનો દરવાજો ખોલી દે છે

ગુજરાતના પ્રથમ ૧૧૧ કિલો

ખંભાળિયાના દાત્રાણામાં ૧૧ સદી જુનું દંતેશ્વર મહાદેવનું મંદિર

ખંભાળિયા દ્વારકા હાઇવે પર દામાણા ગામ નજીક ઇસ.દસમી સદીમાં એટલે કે ૧૧૦૦ વર્ષ પુર્વ સ્થાપિત થયેલા અને પુરાતત્વ ખાતાએ જેને રક્ષિત સ્મારક અતિ પ્રાચિન અને ચમત્કારિક શિવ મંદિર આવેલું છ.
ઉંચા ઓટલા પર મંદિર નીચે પગથીયા ઉતરીને દર્શન થાય છે, જેના થાય છે, જેના પ્રવેશ દ્વારા પર ૬૪ જોગણીઓની પ્રાચીન પ્રતિમાઓ આવેલી છે. મંદિરની પ્રદક્ષિણા પથના પગ દિવાલોમાં કાળની થપાટોથી જર્જરીત થયેલી પ્રાચીન દેવદેવીઓની મૂર્તિઓ છે.