Monday, 4 August 2014

गुरु पूर्णिमा: जागरूकता से मिलते हैं गुरु

जब तक हमारी इंद्रियां सक्रिय नहीं हैं, हमारे भीतर जागरूकता नहीं है, तब तक गुरु के होते हुए भी हमें गुरु नहीं मिलता। गुरु हमें तभी मिलता है, जब हम पूरी तरह जागरूक हों।
गुरु पूर्णिमा (12 जुलाई) पर ओशो का चिंतन..
गुरु की खोज जितनी सरल और सहज हम समझते है, उतनी आसान नहीं है। कोई नहीं कह सकता, 'वहां जाओ और तुम्हें तुम्हारा सद्गुरु मिल जाएगा।' तुम्हें खोजना होगा, खोजने के दौरान जिन मुश्किलों का सामना करोगे, उनके द्वारा ही तुम उसे पहचानने के योग्य हो पाओगे। तुम्हारी आंखें स्वच्छ हो जाएंगी। आंखों के आगे आए बादल छंट जाएंगे और बोध होगा कि यह सद्गुरु है।
एक सूफी फकीर था जुन्नैद। वह अपनी जवानी के दिनों में जब गुरु को खोजने चला तो वह एक बूढ़े फकीर के पास गया। उससे कहने लगा, 'मैंने सुना है कि आप सत्य को जानते हैं। मुझे कुछ राह दिखाइए।' बूढ़े फकीर ने एक बार उसकी ओर देखा और कहा, 'तुमने सुना है कि मैं जानता हूं, तुम नहीं जानते कि मैं जानता हूं।'
जुन्नैद ने कहा, 'आपके बारे में मैं कुछ नहीं जानता। बस मुझे वह राह दिखाएं जहां मैं अपने गुरु को खोज लूं। आपकी बड़ी कृपा होगी।' वह बूढ़ा आदमी हंसा और कहने लगा, 'जैसी तुम्हारी मर्जी, बता तो मैं दूंगा, लेकिन खोजना तुम्हें ही होगा। मुझे लगता है तुम्हें काफी भटकना पड़ेगा, क्या इतना साहस और धैर्य है तुम में?'
जुन्नैद ने कहा, 'उसकी चिंता आप जरा भी मत करें, धैर्य और साहस मुझमें है। बस मुझे यह बता दें कि गुरु कैसा दिखाता होगा? कैसे कपड़े पहने होगा?' फकीर ने कहा, 'उसकी जटाएं बहुत लंबी होंगी। उसकी आंखों में प्रकाश जैसी आभा होगी। वह नीम के वृक्ष के नीचे बैठा होगा। उसके आसपास तुम्हें कस्तूरी की गंध महसूस होगी।'
जुन्नैद बीस वर्ष तक यात्रा करता रहा। एक जगह से दूसरी जगह। बहुत कठिन मार्ग से चल कर गुप्त जगहों पर भी गया। लेकिन उसे न तो वह पेड़ मिला, न किसी की आंखों में प्रकाश और न ही कस्तूरी सुगंध ही मिली। बीस वर्ष बाद वह एक वृक्ष के पास पहुंचा। गुरु वहां पर था। कस्तूरी की गंध भी महसूस हो रही थी उसके आसपास। हवा में शांति भी थी। उसकी आंखें प्रज्ज्वलित थीं प्रकाश से। उसकी आभा को उसने दूर से ही महसूस कर लिया।
यही वह व्यक्ति था, जिसकी वह तलाश कर रहा था। जुन्नैद गुरु के चरणों पर गिर गया। आंखों से उसके आंसू की धार बहने लगी, 'गुरुदेव, मैं आपको बीस वर्ष से खोज रहा हूं।'
गुरु ने उत्तर दिया, 'मैं भी बीस वर्ष से तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूं। देख जहां से तू चला था यह वही जगह है। देख मेरी ओर। जब तू मुझसे गुरु की पहचान पूछने आया था, तब से मैं यहां तेरा इंतजार कर रहा हूं।' जुन्नैद रोने लगा। बोला, 'आपने मेरे साथ मजाक क्यों किया? आप पहले ही कह सकते थे मैं तेरा गुरु हूं। बीस वर्ष बेकार कर दिए।'
बूढ़े आदमी ने जवाब दिया, उससे तुझे कोई मदद न मिलती। उसका कुछ उपयोग न हुआ होता। क्योंकि जब तक तुम्हारे पास आंखें होते हुए भी देखने के लिए आंखे नहीं हैं, नाक होते हुए भी सूंघने के लिए नाक नहीं है, तब तक सब व्यर्थ था। इन बीस वषरें तुम देखना, सूंघना, महसूस करना सीखे हो। मैं वहीं व्यक्ति हूं, जिसे तुम बीस साल पहले नहीं पहचान पाए, लेकिन अब पहचान सके। तुम बदल गए। इन पिछले बीस वषरें ने तुम्हें मांजा है। सारी धूल छंट गई। तुम्हारा मैं विलीन हो गया। तुम्हारे नासापुट संवेदनशील हो उठे, जो इस कस्तूरी की सुगंध को महसूस कर सके। कस्तूरी की सुगंध तो बीस साल पहले भी यहां थी। तुम्हारा हृदय स्पंदित हो गया है, उसमें प्रेम का मार्ग खुल गया है। वहां पर एक आसन निर्मित हो गया है, जहां तुम आपने प्रेमी को बिठा सकते हो। यह संयोग तब संभव नहीं था।
मैं नहीं कहता कि गुरु पर श्रद्धा करो। केवल इतना कहता हूं कि ऐसा व्यक्ति खोजो, जहां श्रद्धा घटित होती है। वही व्यक्ति तुम्हारा गुरु है। तुम्हें घूमना होगा, क्योंकि खोजना आवश्यक है। खोज तुम्हें तैयार करती है। ऐसा नहीं है कि खोज तुम्हें तुम्हारे गुरु तक ले जाए। खोजना तुम्हें तैयार करता है, ताकि तुम उसे देख सको। हो सकता है वह तुम्हारे बिल्कुल नजदीक हो।


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