भगवान विष्णु के योगनिद्रा में जाने के उपरांत प्रारंभ हुआ चातुर्मास हमें संयम और सहिष्णुता की साधना करने के लिए प्रेरित करता है।
मान्यता है कि चातुर्मास में ब्रहमा जी द्वारा सृष्टि निर्माण का कार्य जारी रहने के कारण चातुर्मास में विष्णु जी निष्क्रिय रहते हैं। इस अवधि में वे योगनिद्रालीन हो जाते हैं। शास्त्रों में इस दौरान अनेक कार्र्यो को निषिद्ध बताया गया है। सामान्य व्यक्ति के लिए यह अवसर संयम को साधने का है। आज की जिंदगी में जब लोगों में सहिष्णुता कम होती जा रही है, ऐसे में संयम की यह साधना अति आवश्यक हो जाती है। संयमित आचरण से हम मन को वश में करना सीख पाते हैं।
चातुर्मास की अवधि आषाढ़ मास से शुरू होकर कार्तिक मास तक चलती है। इस वर्ष यह आज 9 जुलाई के प्रात: से प्रारंभ होकर 3 नवंबर तक रहेगी। इन चार मासों में शास्त्रों ने हमारे संयम की परीक्षा लेने के लिए जो विधान बनाए हैं, उनमें हमारा हित-चिंतन निहित है। धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि आरोग्य विज्ञान व सामाजिक दृष्टि से भी वह महत्वपूर्ण हैं। जैसे शास्त्रों के अनुसार, सावन में साग, भादों में दही, अश्विन में दूध और कार्तिक में दाल खाना वर्जित बताया गया है। सावन में खाद्य वनस्पितियों के साथ-साथ जहरीली वनस्पतियां भी उग आती हैं। आयुर्वेद के अनुसार, दूध और दही वात और कफ बनाते हैं। इस मौसम में वात और कफ की प्रधानता रहती है, इसलिए इसका निषेध है। इसी प्रकार अन्य विधानों में भी हमारा हित चिंतन ही निहित है।
चातुर्मास में ही रक्षाबंधन, जन्माष्टमी, गणेशोत्सव, नवरात्र, दशहरा, करवाचौथ, शरद पूर्णिमा और दीपावली जैसे महत्वपूर्ण त्योहार मनाए जाते हैं। त्योहारों का उल्लास संयमित रहे, इसलिए शास्त्रों में विवाह, मुंडन, यज्ञोपवीत, नवगृह प्रवेश आदि शुभ कार्र्यो को निषिद्ध किया गया है। इन शुभ कार्र्यो में विष्णु भगवान को साक्षी बनाकर संकल्प लिया जाता है, किंतु योगनिद्रालीन होने के कारण उनका आवाहन संभव नहीं है। महर्षि भृगु जी ने विष्णु जी को श्रीहरि को त्रिदेवों में सबसे संयमी व सहिष्णु पाया था। जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए संयम की साधना अति आवश्यक है। चातुर्मास हमें मन के वेग को संयम की रस्सी से बांधने की प्रेरणा देता है।

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