गुरु अंगुली पकड़कर नहीं चलाता, बल्कि शिष्य के मार्ग को प्रकाशित कर
देता है। चलना शिष्य को ही पड़ता है। पूरे संसार में यह गुरु-तत्व व्याप्त
है, तभी हम किसी से भी कुछ भी सीख सकते हैं।
व्यास उमाशंकर शर्मा का चिंतन..
हमारी संस्कृति में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश से भी अधिक महत्व दिया गया है, परंतु गुरु अपने को ऐसा नहीं मानता। वह केवल शिष्य की श्रद्धा में अतिविशिष्ट है, क्योंकि स्वयं को सर्वोच्च मानने पर गुरु स्वयं अहंकार द्वारा पतन की ओर उन्मुख हो सकता है। गुरु का कार्य शिष्य को अध्यात्म की ओर प्रेरित करना है। दूसरे अर्थो में कह सकते हैं कि गुरु केवल व्यक्ति नहीं, बल्कि एक तत्व है और वह तत्व किसी भी अवस्था या रूप में हो सकता है। व्यावहारिक भाषा में हम कह सको हैं कि गुरु तब तक है, जब तक उसमे कोई लौकिक स्वार्थ या प्रलोभन न जुड़ा हो।
गुरु शिष्य को अंगुली पकड़कर नहीं चलाता, बल्कि उसके मार्ग को प्रकाशित करता है। शिष्य को स्वयं ही उस मार्ग पर चलना होता है। सारे संसार में यह गुरुतत्व व्याप्त है। वह प्रत्येक व्यक्ति के लिए, प्रत्येक दिन तथा प्रत्येक देश में प्राप्त होता है। केवल शिष्य को खोजी होना
चाहिए, उसके अंत:करण में यह ललक विद्यमान होनी चाहिए कि उसे गुरु मिलें। गरुड़ जी पक्षियों के राजा हैं, किंतु उन्होंने कागभुशुंडि जी को अपना गुरु बनाया। वह कहते भी यही हैं कि बिना गुरु के संसार रूपी सागर से उद्धार संभव नहीं, चाहे वह ब्रह्मा हों अथवा शंकर ही क्यों न हों। श्रीराम और श्रीकृष्ण साक्षात ईश्वर माने गए हैं, किंतु जब वे अवतार लेकर इस धरती पर आते हैं, तब वह भी गुरु का ही वरण करते हैं। श्रीराम गुरु वशिष्ठ जी व विश्वामित्र को तथा भगवान श्रीकृष्ण महर्षि सांदीपनि को अपना गुरु बनाते हैं।
वास्तव में जिसके समक्ष
जाकर हमारे हृदय में आस्था, विश्वास तथा प्रेम का उदय हो जाए, वस्तुत: वही हमारा गुरु है। एक विदेशी विद्वान पालविंटन ने भारत आकर अनेक विद्वानों तथा महापुरुषों से संपर्क किया, जिनमें कई योगियों के चमत्कार भी उन्होंने देखे। किंतु वे सबसे अधिक प्रभावित हुए महर्षि रमण से, क्योंकि उन्होंने चमत्कार को ही अध्यात्म का आधार नहीं माना था। वस्तुत: गुरु चमत्कारों की अपेक्षा अपने ज्ञान से शिष्य का आध्यात्मिक मार्ग प्रकाशित करता है। स्वामी विवेकानंद ने स्वामी रामकृष्ण देव को गुरु के रूप में स्वीकार किया। पुराणों के अनुसार, राजऋषि जनक जी ने अनेक महापुरुषों का सान्निध्य प्राप्त किया, लेकिन उन्हें अपना गुरु न बनाकर अष्टावक्र जी को गुरु के रूप में स्वीकार किया। मान्यता है कि अष्टावक्र जी का शरीर आठ जगह से टेढ़ा था।
वस्तुत: गुरुत्व तो व्यक्ति के ज्ञान में समाहित है। उसे वैभव, ऐश्वर्य अथवा सौंदर्य से नापा नहीं जा सकता।
व्यास उमाशंकर शर्मा का चिंतन..
हमारी संस्कृति में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश से भी अधिक महत्व दिया गया है, परंतु गुरु अपने को ऐसा नहीं मानता। वह केवल शिष्य की श्रद्धा में अतिविशिष्ट है, क्योंकि स्वयं को सर्वोच्च मानने पर गुरु स्वयं अहंकार द्वारा पतन की ओर उन्मुख हो सकता है। गुरु का कार्य शिष्य को अध्यात्म की ओर प्रेरित करना है। दूसरे अर्थो में कह सकते हैं कि गुरु केवल व्यक्ति नहीं, बल्कि एक तत्व है और वह तत्व किसी भी अवस्था या रूप में हो सकता है। व्यावहारिक भाषा में हम कह सको हैं कि गुरु तब तक है, जब तक उसमे कोई लौकिक स्वार्थ या प्रलोभन न जुड़ा हो।
गुरु शिष्य को अंगुली पकड़कर नहीं चलाता, बल्कि उसके मार्ग को प्रकाशित करता है। शिष्य को स्वयं ही उस मार्ग पर चलना होता है। सारे संसार में यह गुरुतत्व व्याप्त है। वह प्रत्येक व्यक्ति के लिए, प्रत्येक दिन तथा प्रत्येक देश में प्राप्त होता है। केवल शिष्य को खोजी होना
चाहिए, उसके अंत:करण में यह ललक विद्यमान होनी चाहिए कि उसे गुरु मिलें। गरुड़ जी पक्षियों के राजा हैं, किंतु उन्होंने कागभुशुंडि जी को अपना गुरु बनाया। वह कहते भी यही हैं कि बिना गुरु के संसार रूपी सागर से उद्धार संभव नहीं, चाहे वह ब्रह्मा हों अथवा शंकर ही क्यों न हों। श्रीराम और श्रीकृष्ण साक्षात ईश्वर माने गए हैं, किंतु जब वे अवतार लेकर इस धरती पर आते हैं, तब वह भी गुरु का ही वरण करते हैं। श्रीराम गुरु वशिष्ठ जी व विश्वामित्र को तथा भगवान श्रीकृष्ण महर्षि सांदीपनि को अपना गुरु बनाते हैं।
वास्तव में जिसके समक्ष
जाकर हमारे हृदय में आस्था, विश्वास तथा प्रेम का उदय हो जाए, वस्तुत: वही हमारा गुरु है। एक विदेशी विद्वान पालविंटन ने भारत आकर अनेक विद्वानों तथा महापुरुषों से संपर्क किया, जिनमें कई योगियों के चमत्कार भी उन्होंने देखे। किंतु वे सबसे अधिक प्रभावित हुए महर्षि रमण से, क्योंकि उन्होंने चमत्कार को ही अध्यात्म का आधार नहीं माना था। वस्तुत: गुरु चमत्कारों की अपेक्षा अपने ज्ञान से शिष्य का आध्यात्मिक मार्ग प्रकाशित करता है। स्वामी विवेकानंद ने स्वामी रामकृष्ण देव को गुरु के रूप में स्वीकार किया। पुराणों के अनुसार, राजऋषि जनक जी ने अनेक महापुरुषों का सान्निध्य प्राप्त किया, लेकिन उन्हें अपना गुरु न बनाकर अष्टावक्र जी को गुरु के रूप में स्वीकार किया। मान्यता है कि अष्टावक्र जी का शरीर आठ जगह से टेढ़ा था।
वस्तुत: गुरुत्व तो व्यक्ति के ज्ञान में समाहित है। उसे वैभव, ऐश्वर्य अथवा सौंदर्य से नापा नहीं जा सकता।

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